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थक गई हूँ रोज-रोज


थक गई हूँ रोज-रोज

पतझड को

बुहारते बुहारते,

गिर जाने दो

जमीं पर

सारे पत्तों को

एक एक कर,

कि

मैं समेट सकूँ

एक साथ सबको।